चाँद और रात : नए परिप्रेक्ष्य में


चाँद और रात : नए परिप्रेक्ष्य में 



 

जैसे लोनलिनेस और साॅलिटयूड में अन्तर होता है वैसे ही रात और अंधेरी रात में भी फर्क़ होता है। अब भला ये क्या बात हुई मतलब रात में अंधेरा तो होता ही है तो हर रात अंधेरी रात हुई। तुम भी न हर बात में कोई - न- कोई बेतुकी फिलाॅसफी घुसा देती हो। छोड़ो रात को जीने वाले इसका फर्क़ बेहतर जानते है। वैसे बड़ी अजीब बात है लोगों को सुबह का इंतजार रहता है रात की तो कोई अहमियत ही नहीं। जिनके आँखों में सपने होते हैं उन्हें दिन का इंतजार होता है। सही भी है आखिर सपने पूरे करने की कोशिश दिन में ही की जा सकती । लेकिन फिर रात का क्या? कुछ लोग रात काटते हैं तो कुछ रात बिताते हैं। मुझे लगता है रात का हर शख्स के जिंदगी में  अलग मायने है। दिन भर काम कर घर आने वाले थके हारे इंसान के लिए रात सुकून है। कम्पटिशन की तैयारी करने वाले के लिए दिन के 24 घण्टों से चुराए हुए कुछ एक्स्ट्रा घण्टे है रात। पता नहीं लोगों को रात में सिर्फ अंधेरा, नेगेटिविटी ही क्यों दिखती। कहते हैं हर रात की सुबह होती है पर हर सुबह को रात की जरूरत होती है। दिन भर के पचरो से निजात देती है रात। खुद को थोड़ा और समझने का वक्त देती है रात। रात में घुला अंधेरा अकसर जिंदगी में छाये अंधेरे से बाहर निकलने का रास्ता दिखाता है। पूरे दिन के भाग- दौड़, शोर, से कहीं दूर सुकून से मुलाकात कराता है।


 
कामयाबी का सूरज होता है पर चांद नहीं शायद इसलिए क्योंकि चांद की चमक उसकी खुद की नहीं और इंसान को कामयाबी का श्रेय  किसी और को देते बनता नहीं। पता नहीं क्यों समझ नहीं आता कि दिन को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है जब कामयाबी रात - दिन की गयी मेहनत से हासिल होती सिर्फ दिन की नहीं।और भटके हुए राही को रास्ता भी तो ध्रुव तारा दिखाता है सूरज नहीं। चलो ठीक है कि माना सूरज चांद की तरह तफरी नहीं मारता हर 14 दिन पर मगर तारे तो हमेशा रहते ना रात में भी और दिन में भी। वो बात अलग है कि सुबह दिखते नहीं पर होते तो है। चढते सूरज को ही सब सलाम करते ढलते चांद और रात की कोई खास अहमियत नहीं। वो चांद जिसने पूरा दिन देखा। जिसे नए सुबह के नए सूरज से ज्यादा तजुर्बा है पहर का। छोड़ो जिन कानों में दिन के शोरगुल ही गूंजते हो वो रात की ख़ामोशियाँ कहा सुन पाएंगे। ये दिन के उजालों से चौंधियाई हुई आंखे रात की गहराईयाँ कैसे देख पाएंगे। फिर भी लगता है कुछ लोग होंगे जरूर जो नाकामयाबी को कामयाबी के लिए मील का पत्थर मानते होंगे। जो रात को दिन से कम नहीं आंकते होंगे।
कभी- कभी तो मैं मुझे समझ ही नहीं आती। तुम्हें रात से इतनी हमदर्दी भला क्यों? हाँ वैसे , सुनने में तो बात सही लग रहीं । दिन से तुम्हारी कोई जातीय दुश्मनी मालूम पड़ती है। खैर, काफी रात हो गयी, इजाजत चाहती हूँ।
शब्बा खैर!

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