सेल्फ लव
आज बगल वाली टेबल पर एक मध्यम उम्र के व्यक्ति बैठे थे।आसपास हर टेबल पर कोई - न- कोई अपने परिवार के साथ आया था लेकिन वो बिल्कुल अकेले थे। अकेले होने के बावजूद अकसर हम लोगों से दूर अलग- थलग किसी कोने में बैठने के बजाय वो परिवार और बच्चों से घिरे टेबल पर बैठे थे। शायद हमसे पहले आए थे इसलिए जब हम पहुंचे तब तुरंत ही उनका ऑर्डर आ गया। ऑर्डर में पारंपरिक थाली थी ।
वैसे साइकाॅलजी कहती हैं कि जो व्यक्ति अकेले सिनेमा देखने या रेस्तरां में खाना खाने जा सकता है वह मानसिक रूप से बहुत मजबूत होता है। आज पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति को देखा। आसपास मौजूद लोग उन्हें संदेह या सहानुभूति भरी दृष्टि से देख रहे थे। कुछ फुसफुसाहट भी सुनाई दे रही थी।सोशल मीडिया पर हम हर दूसरे दिन किसी - न-किसी को सेल्फ केयर और सेल्फ लव का महत्व समझाते हुए पाते हैं लेकिन असल जिंदगी में सेल्फ लव को लोग बड़े जजमेंटल होकर देखते है। "अरे बड़ा स्वार्थी है" , "नहीं - नहीं लगता है परिवार में कोई नहीं इसका"," मेरी मानो घरवाली से झगड़ कर आया होगा" आदि।
हमारा समाज सेल्फ लव को आधुनिकता के चोंचले मानता है। और जो लोग इसके मायने समझते भी है वो भी इसका दायरा केवल लड़कियों और औरतों तक सीमित मानते हैं। मर्दों के लिए तो सेल्फ लव क्या इमोशन शब्द भी पाप माना जाता है।
माना मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है लेकिन समाज से परे उसका एक व्यक्तिगत जीवन भी है। उस जीवन में भी एक अंश है जिसमें व्यक्ति अपने-आप के साथ सहज होता है। और अपने आप के साथ सहज होना ही तो सेल्फ लव है। बहुत कम लोग खुद की जिंदगी में खुद का महत्व समझ पाते हैं। खुद के संघर्ष को सराहते है। वरना लोग अमूमन फॅमिली मैन के टैग के कारण इस सेल्फ लव शब्द को स्वीकार तक नहीं कर पाते हैं। और भूल जाते हैं कि जिंदगी के कई ऐसे पराव होते हैं जहां उनके साथ उनके रिश्तेदार, परिवार या दोस्त-यार साथ नहीं होते । अगर कोई उनके साथ होता है तो वो खुद होते हैं। इसलिए खुद का ख्याल रखना, खुद को खास महसूस कराना, खुद के साथ वक्त बिताना, खुद को खुश रखना और खुद पर प्यार जताना बहुत जरूरी है । आखिर हम खुद के लिए इतना तो कर ही सकते हैं।

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